सोमवार, सितंबर 25, 2017

आओ नया संकल्प लें.
गणतंत्र दिवस का त्यौहार करीब है. इस त्यौहार की शुरुआत देश की आज़ादी के कई बरसों बाद हुई. ये आज़ादी आसानी से नहीं मिली थी.इसके लिए बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ी थी. लेकिन आज़ादी के छे दहाइयों के गुजरने के बाद आज देश की जो सूरतेहाल है, उसका अगर थोडा भी आभास जंगे-आज़ादी के मतवालों को रहा होता तो वो शायद अपनी जानें निछावर नहीं करते. देश अच्छा है, इसकी सभ्यता पुराणी है, हुकूमत का ढांचा भी लोकतांत्रिक है, इस सब के बावजूद ये कहना सही नहीं होगा कि आज हमारी हालत अछि है, हम आजाद हैं. हाँ, अगर यहाँ कोई आजाद है तो वह भ्रष्ट और हर तरह से देश को लूटने वाले लोग हैं. इसका एक महत्वपुर्ण कारण शयेद ये है कि भारत कि मिटटी में सब को माफ़ करने का खमीर मौजूद है. दूसरी बड़ी विडंबना ये है कि यहाँ कभी कोई इंक़लाब नहीं आया. सहयेद पुरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जो आज भी जन आन्दोलन से दूर है. यहाँ लोगो कि सब कुछ बर्दाश्त कर लेने कि आदत है और इसी आदत कि वजह से उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं होता कि असम में जो लोग मारे जाते हैं, वो कौन हैं और क्यूँ मारे जाते हैं? महाराष्ट्र में जब उत्तर भारतियों को मारा पीटा जाता है तो उसके खिलाफ केवल लखनऊ, पटना, रांची और किसी हद तक दिल्ली में प्रदर्शन होता है. मणिपुर को महीनो बंधक बना लिया जाता है, मगर देश के दुसरे हिस्सों में बहुत कम लोगों के कानो पर जूँ रेंगती है. जम्मू वो कश्मीर कि समस्या को कुछ लोग आज भी हिन्दू-मुस्लिम की ऐनक से देखने की हिमाक़त करते हैं. इससे भी बढ़कर आतंकवाद का रंग भी कभी हरा और कभी भगवा दिखाई देता है.
आज़ादी के इतने बरसों बाद भी हम देशवासी को एक देशवासी और इंसान क्यूँ नहीं मान पाए, ये एक बड़ा और जवाब तलब सवाल है. हमारे लिए ये प्रश्न इस लिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है क्यूंकि मुझे लगता है कि अगर हमारे अन्दर इंसान को इंसान और गुनाहगार को गुनाहगार मानने कि समझ और आदत पड़ जाये तो शयेद सूरतेहाल में बड़ी तब्दीली आ सकती है. इस गणतंत्र दिवस पर हमें अपने अन्दर इस तरह कि समझ पैदा करने का संकल्प करना होगा. इसके बाद ही हम भ्रष्टाचार के खिलाफ असरदार लड़ाई लड़ सकते हैं. तभी देश से आंतंकवाद का खात्मा हो सकता है और और शायद तभी महंगाई कि मार से एक आम आदमी बच सकता है.
इस छोटे से लेख में सभी सब्जेक्ट को छूने का कारण है. ये हमारे नए ब्लॉग का पहला लेख है. इसमें हम उन सभी बातों कि तरफ इशारा करना चाहते हैं जो हमें परेशान करती रहती है. हम देश का हिस्सा हैं. भारत केवल जमीन के एक टुकरे का नाम नहीं है. ये एक सभ्यता है जिसमे बहुत सी संस्कृतियाँ हैं. ऐसे में इसे संजोये रखना हमारी भी जिम्मेदारी है. इस सभ्येता से खिलवाड़ करने कि परंपरा को तोडना ज़रूरी है.

DD News का मेरा सफर

देखते ही देखते 4 साल बीत गए. 23 सितंबर 2013 को जब डीडी न्यूज़ में पहली बार कदम रखा तो खुद पर यक़ीन नहीं हुआ. जिस न्यूज़ चैनल को बचपन से (डीडी न्यूज़ आने से पहले नेशनल पर न्यूज़ प्रसारित होती थी) देखा करता था, उसी का हिस्सा बनने जा रहा था.
चार साल के सफर में बहुत कुछ पाया। अच्छे दोस्त, बड़े भाई समान सीनियर, मेरी परेशानी को गंभीरता से समझने वाले बॉस और बहुत कुछ. किसी न्यूज़ चैनल में काम करने का ये मेरा पहला अनुभव था. सुना था न्यूज़ चैनल में आप को सिखाने वाले कम और आप की कमियां निकालने वाले ज़्यादा होते हैं. ये डर दिल में बैठ गया था, लेकिन यहाँ आकर देखा तो कहानी बिलकुल उसके उलट थी. खुद पर यक़ीन नहीं हुआ कि मैं एक ऐसे न्यूज़ चैनल में काम कर रहा हूँ, जहाँ सीनियर को सीनियर कम बड़े भाई के रूप में ज़्यादा पाया। हाथ पकड़ कर सिखाने वाले देखे। तकलीफ के वक़्त मज़बूती से उन्हें अपने साथ खड़ा पाया। मायूसी और नाउम्मीदी के वक़्त स्नेह के साथ उनके हाथ को अपने सर पर पाया।
डीडी न्यूज़ ने मुझे एक पहचान दी. एंकर बनने का ख़्वाब भी यहीं पूरा हुआ, जब करीब बीस दिनों तक मैंने डीडी भोपाल से समाचार पढ़ा. इसके लिए मैं तत्कालीन असिस्टेंट डायरेक्टर न्यूज़ श्री मज़हर महमूद साहब और उस वक़्त के दूरदर्शन केंद्र भोपाल के न्यूज़ डायरेक्टर श्री मनीष गौतम जी का शुक्रगुज़ार रहूँगा जिन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचान बनाने का अवसर प्रदान किया।
डीडी न्यूज़ के इस चार साल के सफर में कुछ गम और डरावने वक़्त को भी गुज़रते देखा। एक ऐसा लम्हा भी आया, जब लगा कि शायद अब सबकुछ खत्म हो गया. खुद को टूट कर बिखरता पाया। पापा का साथ (24 मई 2016) छूट गया. एक साल से ज़्यादा का अरसा गुज़र गया, लेकिन पापा की जुदाई आज भी मुझे रुलाती रहती है. बड़ा हो गया हूँ लेकिन दिल के अंदर का बच्चा अब भी अपने पिता को ढूंढता है.
कहते हैं ज़िंदगी इम्तेहान का दूसरा नाम है. तूफ़ान और भी आये. लेकिन मैं शुक्रगुज़ार रहूँगा डीडी न्यूज़ के अपने सभी सहकर्मियों का विशेष रूप से Faheem Ahmad, Zaheer Ashfaque, बड़ी बहन समान Anchor Reshma Farooqui मैडम का, Rashid भाई, Shameem भाई, Azwar भाई, Pradeep भईया, वीडियो एडिटर Lokesh उर्फ़ Lucky भाई और Sanjay भईया का, जो मज़बूती से मेरे साथ खड़े रहे और मानसिक रूप से इस तूफ़ान से लड़ने का मुझमें हौसला बढ़ाते रहे.
बस चलते चलते यही कहूंगा कि बहुत कुछ सीखा यहाँ, बल्कि कहूं कि सीख रहा हूँ जॉब और जीवन दोनों में रोज़ एक नया अनुभव!!!
एक बार फिर से शुक्रिया, आप सब का शुक्रिया, शुक्रिया मेरे खुदा।
मेरी कामयाबी के लिए रोज़ दुआएं करने वाली मेरी माँ Mrs Shamima Shabbir सबसे ज़्यादा आप का शुक्रिया। क्योंकि किसी भी परिस्थिति से लड़ने का जज़्बा आप से ही सीखा है और सीख रहा हूँ.